શકીલ કાદરીની ગઝલો

ઉર્દૂ અને ગુજરાતી ગઝલો

कातिल को है

कातिल को है ग़ुरूर बहुत क़त्लगाह पर
लेकिन फ़क़ीर की है नज़र ख़ानक़ाह पर

इल्ज़ाम रौशनी के परिंदों के क़त्ल का
साबित करोगे कैसे? है आलमपनाह पर

लगता है उस की आँखों में महेफ़ूज़ है हया
पर्दा जो डालता है किसी के गुनाह पर

इन्सानीयत का चाहने वाला हूँ इस लिये
सब कुछ लुटा रहा हूँ किसी की निगाह पर

जितने परिंदे ज़ख़्मी हैं तीरों से सब के सब
इल्ज़ाम ज़ख़्म देने का धरते हैं शाह पर

मैं हूँ फ़क़ीर कासे में अपना ही सर लिये
बेख़ौफ़ चल रहा हूँ ख़ुदा तेरी राह पर

इन्साफ़ की तवक़्क़ो अदालत से क्या रखें
उसने यक़ीन कर लिया झूटे गवाह पर

लगता है शाह को है परिंदों से दुश्मनी
नोंचे हुए पड़े हैं यहाँ गाह-गाह पर

नटवर था श्याम और सियाहफ़ाम थे बिलाल
फिर नाज़ क्यूँ न हो मुझे रंगे-सियाह पर

सरमद का मैं मुरीद हूँ कहेता हूँ शान से
अल्लाह पर यक़ीं है, नहीं बादशाह पर

होने न देगी ज़ुल्म किसी पर ‘शकील’ अब
है मुझ को एतेबार वतन की सिपाह पर

– शकील क़ादरी

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