શકીલ કાદરીની ગઝલો

ઉર્દૂ અને ગુજરાતી ગઝલો

हसीन आँखों में

हसीन आँखों में गहरा ख़ुमार दर्द का है
मरीज़े इश्क़ हूँ बस एतबार दर्द का है

दयारे इश्क़ में रुख़ ताबदार दर्द का है
हर इक दुकाँ में यहाँ कारोबार दर्द का है

ख़ुशी वो कर दे अता ग़म में जो बदल जाये
अज़ल से दिल को मेरे इंतेज़ार दर्द का है

निगाह पड़ते ही सीने में जब कसक उठ्ठी
फ़क़ीर चीख़ उठा ये मज़ार दर्द का है

खड़ा है कब से तेरे दर पे एक दीवाना
शिकार जिसने किया बार बार दर्द का है

ख़ुदा के वास्ते इल्ज़ामे मयकशी न लगा
अभी जो रंग है आँखों में यार दर्द का है

जो ज़ख़्म दिल पे लगे उन को फूल समझेगा
नज़र में जिस की बड़ा ही वक़ार दर्द का है

छुपाले चहेरा कोई शख़्स पढ़ के हंस देगा
नुमायाँ जो है वहाँ इश्तिहार दर्द का है

‘शकील’ हुस्न के बाज़ार में ख़ड़ा है जो
किसे ख़बर है वो उम्मीदवार दर्द का है

– शकील क़ादरी

Leave a Reply

Your email address will not be published.

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>