શકીલ કાદરીની ગઝલો

ઉર્દૂ અને ગુજરાતી ગઝલો

ख़ुदी से बेख़ुदी

ख़ुदी से बेख़ुदी में डूब कर क्या देख लेता हूँ ?
ठहरते ही नज़र क़त्रे में दरिया देख लेता हूँ

नज़र जब पार कर जाती है सरहद ला इलाहा की
तो हर ज़र्रे पे इललल्लाह लिक्खा देख लेता हूँ

नज़र आती है उस में भी ख़ुदा की शाने यकताई
घना जब एक शजर सहरा में तन्हा देख लेता हूँ

चराग़े दिल रक्खा है जिस्म के फ़ानूस में जिस ने
उसी के नूर में अपना ही चहेरा देख लेता हूँ

कहीं मक़तूल होता हूँ, कहीं मुंसिफ़, कहीं क़ातिल
दिखाये जिस तरह भी तू तमाशा देख लेता हूँ

शबे तारीक में रहबर न हो, मिश्अल न हो फिर भी
जिसे मैं देखना चाहूँ सरापा देख लेता हूँ

बिला सोचे, बिला समझे ही सरदारी नहीं करता
मैं तख़्तोताज से पहले क़बीला देख लेता हूँ

“शकील” इस बज़्म में कितने हंसीं चहरे ही चहेरे हैं
मैं हर चहरे में बस अपना ही चहरा देख लेता हूँ

शकील कादरी

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